हमें बुरा नहीं लगता.....
ट्रेन में दस रुपए की भीख वसूलनी हो या गली में हो ताली ठोकनी....हमें बुरा नहीं लगता.....। बाज़ार में नाचना हो , कोठों पर बिकना हो या फिर सड़कों पर हो ढोलक पीटनी....हमें बुरा नही लगता....। लोग हमें छक्का , हिजड़ा , किन्नर और ना जाने किस-किस नाम से बुलाते लेकिन हमने कभी बुरा नहीं माना....। क्योकि हम खूबसूरत होने की इस दौड़ से बाहर है और शायद यही हमारी खूबसूरती भी है....मगर हमें कभी बुरा नहीं लगता....। जब लेते है लोग हमारा नाम गालियों की तरह....बुरा लगता है..। जब हमारा अस्तित्व सिर्फ संविधान के पन्नो में होता और समाज की आँखो में नही.....। हमें अच्छा लगता जब हमारी दुआएं किसी का भरती हैं आंचल या फिर किसी के नन्हे कदम पहली बार हमारी उँगलियाँ पकड़ती है मगर.... उससे भी कहीं ज्यादा बुरा लगता है जब हमारे सपने हमारे लिंग के भार तले मर जाते है....बुरा लगता है....। जब हमारी अर्थी भी हमारी बदनसीबी पर लाठियों से पीटी जाती है.... और सच कहूँ तो हम कुछ नही चाहते.... ना हमें अधिकार की कोई आरजू.... ना ही हमें भूख है किसी सम्मान की.... और प्रेम उस पर तो हम अपना.... हक मांग...