आओ राजनीति झमकायें ।
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर दावेदारों ने अपनी -२ कमर कस ली है । सब एक दूसरे का हाल चाल पूछने में लगे हैं क्योंकि पंचायत चुनाव का बिगुल बजने वाला है। शायद वैसे कभी आपके हालात तक जानने की कोशिश नहीं की होगी ।
कहा जाता है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए अपने चरित्रों को भी गिरवी रख देता है । चुनाव चाहें किसी का हो गहमा गहमी शुरू हो जाती है जिससे पंचायत चुनाव में जमकर मस्ती और कभी-कभी हुडदंग की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है । हुडदंग को काबू में करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड जाता है ताकि हुडदंग को काबू कर सकें ।
विगत वर्ष २०१५ में पंचायत चुनाव अक्टूबर महीने में संपन्न हो गए थे और २०१६ का वर्ष आते -आते लोग गांव के मुखिया बनकर अपने को चमकाने लगे, कुछ ने रौब झाडा तो किसी ने बराबरी का हक दिया । किसी ने विकास किया तो किसी नें की घपलेबाजी । खैर धीरे-२ वक्त की धुरी घूमने के साथ २५ दिसंबर २०२० को कार्यकाल पूरा हो गया कोरोना ने प्रधानों का हक छिनवाकर नियुक्त प्रशासकों को सुपुर्द करवा दिया जिससे गांव के मुखिया की हनक कुछ हद तक कम हो गई । फिलहाल गांव के मुखिया दुबारा सफेद पोशाक पहनने की ललक में स्वयं को ईमानदार, योग्य, जुझारू और कर्मठ जैसे कई शब्दों से रंगी होर्डिंग जनता के बीच प्रेषित करने में जुट गये ।
मौसम सर्द है जिससे राजनीति करते और अच्छा लगता है क्योंकि गांव में आज भी चौपालें है देर रात तक गांव में अलाव के सहारे बैठकें होतीं है और पूरी बैठक वर्तमान के दौर की ' परधानी ' की बहस में गुजर जाती है सब अपने चहेतों को सफेद पोशाक पहनाने की बात करते है । कहते हैं कि ' देखउ परधान अबकी अपनो भतीजो बनिहइ बोट-ओट देहाउ सबसे पहिले तुमहिं का कालोनी और शौचालय देइवि ' खैर ये राजनीति है ।
उधर दूसरा अलाव जल रहा है जहां मौजूदा प्रधान भी बैठक में भाग ले रहे है कुछ समर्थक प्रधान की हां में मुडवा हिला रहे है , बातचीत शुरू है, मुखिया साहब कहते है ' भइया वोट-ओट दिवइउ यहु परधानी मा कइअउ लफडा हुइ गए ताके मारे कोई काम नाइ कराई पाए अबकी जो काम बतइउ वोइ तुरंत हुइंहईं ।
ये व्यक्ति खासकर उन नौजवानों की भी सुध लेने में लगे हैं ,फोन करके कहते हैं ' राम राम भतीजे, राम राम पोता और जयराम भइया ' इन्ही शब्दों के साथ हाल चाल की शुरूआत होती है और वोट देने पर अंत । हम मुखिया की बातचीत के अंश बता रहे है,,, बात के अंश कुछ इस प्रकार है ' राम राम भइया, भतीजे और पोता,, औरु सुनावउ ठीक हउक्ष । का हाल हइ बहुत दिन हुइ गए आये नाइ । चलउ परधानी मा जरूर घूमि जइअउ ।अबकी फिर से खडे हइं एक बार जोर लगाइ देउ भइया तुम्हारो काम पहिले हुही बाकी काम सब बादि मा, औरु हां तुमइ कोई ठेका दइ दिहीं हेनहिं काम करवइउ ' एक बार फिर हालचाल पूछने के बाद फोन की आवाज बंद हो जाती है ।
सदी २१ वीं है और साल २०२१ का। समय अपनी पूरी रफ्तार से दौड रहा है और वर्तमान मुखिया भी उससे तेज दौड रहे है क्योंकि समय ज्यादा है नहीं, वैसे मुखिया के तेज दौडने की वजह भी है पांच साल गुजर गए बीते पांच सालों में किसी गरीब , असहाय की मदद की नहीं अब सोंच रहे कि दिन में २४ घंटे की बजाय ४८ घंटे बन जाए और खूब मेहनत कर लें । एक कहावत कही जाती है कि ' जैसा बोओगे वैसा काटोगा ' । जनता ने पांच साल से आपसे उम्मीद की थी कि हमको भी कुछ मिलेगा लेकिन परधान साहब सफेद पोशाक पहनकर बंद गाडी के सफर में खुली छतोंं के नीचे सोने वाले वाशिंदों को दरकिनार कर ऐश-ओ-आराम की हनक में जीते रहे ।
जनता समझ चुकी है कि बहकावे में आना ही सबसे बडा दोष है लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए स्वयं को सशक्त और जागरुक होना होगा हमारा हक हमें मिलना चाहिए इसके लिए मिलकर आवाज बुलंद करनी होगी । जनता का कहना है कि बरसाती मेढ़कों से बचकर रहना है ताकि वो अपना फायदा न उठा पाएं हमें ऐसे व्यक्ति को चुनकर समाज के सामने खडा करना चाहिए जो एक-दूसरे के सुख-दु:ख में भागीदार बनें ।

फोटो परिचय: कुं शोभित सिंह ।
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